सभी ने यहाँ घूंट विष का पिया है।।
तलाशा सभी ने ख़ुशी को यहाँ पर।
मग़र दर्द सारा उसी ने दिया है।।
था जाँ से ज़ियादा भरोसा किसी पर।
उसी ने सरेआम धोखा किया है।।
हरे ज़ख्म जल्दी ही भर जाने हैं अब।
उसे मैंने जो आँसुओ से सिया है।
जो अंदर से कुछ और बाहर से है कुछ।
नही आदमी वो तो बहरूपिया है।।
सफ़र आख़िरी में ख़ुदा याद आये।
मग़र नाम तेरा लबों ने लिया है।।
भले अक़्ल से काम लेती वो होगी।
सदा "राज " दिल पे ही मैंने किया है।।
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