Monday, February 3, 2020

रील लाइफ और रियल लाइफ

अक्सर हम देखते है कि रील लाइफ में अभिनेता और अभिनेत्री के बीच गजब की बॉन्डिंग, केमेस्ट्री, और प्यार देखने को मिलता है...
लेकिन रियल लाइफ में वही पति -पत्नी के बीच , ब्रेक-अप, डिवोर्स, इत्यादि चलता रहता है।

अब बात समझने वाली यह है कि , दर्शक सिनेमाघरों में सिनेमा देखने तो जाते है, परंतु उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि हम यहाँ एक काल्पनिक चित्रण को इंजॉय करने आये है ।

वहीँ दर्शक के निजी मामलों का भी यही हाल है, परिवार के बीच कोई बॉन्डिंग नहीं, पति-पत्नी के दरम्यान कोई समर्पण की भावना नहीं और वगैरह वगैरह।

जिस तरह हम चित्रपट में बॉन्डिंग और अच्छी केमेस्ट्री देखना चाहते है उसी तरह हम अपने निजी संबंधों में वही सब ला पाये तो मेरा यह मानना है कि मूवी से ज्यादा आप अपने किरदार में ज्यादा आनंद महसूस करोगे।" 

कुछ देर जरा तुम रुक जाओ

कुछ देर जरा तुम रुक जाओ
चले जाना तुम भोर भये
बाँहों में तुझको भर लेता
बिना किसी के शोर किये
यौवन तेरा निहार लेता
अरसा हुआ तुझे गौर किये
तू कह देती मै सुन लेता
मन में जैसे एक चोर लिए
श्रृंगार तेरा मै कर देता
है जल उठते हजार दिए
तेरे होठों को चूम लेता
बिना कोई भी देर किये
प्यार का काजल भर देता था
आँखों में एक लकीर लिए
बह जाने दे मन के जज्बातों को
सुन्दर सुंगंध समीर लिए
विरह वेदना प्रेम प्रियतमा
लाज-शर्म से लब है सिले
चंद्ररात की इस बेला में
फिर क्यों है हम आज मिले

आया वो गुब्बारे वाला


"आया वो गुब्बारे वाला!!!.....
फटी धोती, मैली कमीज,
सर पे लाल गमछा डाला
आया वो गुब्बारे वाला
लाल, पीला, हरा , नीला
हिरवा, बैगनी, जामुनी काला
आया वो गुब्बारे वाला
सब बच्चे भागकर आये
अठन्नी, चवन्नी है सब लेकर आये
मुझको दे दो स्वेत निराला
आया वो गुब्बारे वाला
गांव गली में घूमा सारा
थका दुपहरी में बेचारा
पोटली खोल खाया निवाला
आया वो गुब्बारे वाला
हुई साँझ वो लौटा घर पर
कुछ गुब्बारे वो बेचकर
सोया चैन की नींद मतवाला
आया वो गुब्बारे वाला

गाँव में मैंने क्या–क्या देखा

जाना हुआ एक साल गाँव में
सोचा नहीं था वो भी देखा
गाँव में मैंने क्याक्या देखा
आँगन बीच दीवाल जो देखा
आँखे लोगों की लाल जो देखा
ग्राम पंचायत की चाल जो देखा
गाँव में मैंने क्याक्या देखा
सूखे खेत औ खलिहान जो देखा
छटपटाता किसान जो देखा
बड़े बाबु का मकान जो देखा
गाँव में मैंने क्याक्या देखा
मिमियाता इन्सान जो देखा
कहीं नहीं है इमान जो देखा
बोझा हुआ मेहमान जो देखा
गाँव में मैंने क्याक्या देखा
बात- चीत का ढंग जो देखा
रंग हुआ बेरंग जो देखा
चोर पुलिस के संग जो देखा
गाँव में मैंने क्याक्या देखा
सच पे पड़ती मार जो देखा
सर पर खून सवार जो देखा
सब फीका त्यौहार जो देखा
गाँव में मैंने ए सब देखा

मेरा बेटा अब बड़ा हो गया है


मेरा बेटा अब बड़ा हो गया है
अपने पैरों पर खड़ा हो गया है
घूम-घूम कर गांव में सारे
वो सबको बतलाती है
बहु- बेटे की हर दिन चर्चा
लोगों को सुनातो है
दौड़ी-दौड़ी डाकघर में
गिरते पड़ते जाती है
चिट्ठी या संदेशा कोई
ना डाकघर में पाती है
अश्रु भरे नयनों से उसके
बहती गंगा की धारा है
बूढी मां का अब कोई
न जीने का सहारा है
राह जोहती है बच्चों का
एक दिन वापस आयेंगे
वो दिन भी अब दूर नहीं
जब खुशियां आँगन में लाएंगे
बैठ झोपड़ी में बुनती है
सपनो का ताना -बाना है
झूठी तसल्ली दिल को देती
ये तो एक बहाना है
ऐसे ही एक दिन उसके
प्राण पखेरू उड़ गए
तोडा नाता इस धरा से
ऊपर वाले से जुड़ गए

अब घर नहीं, मकान बनते है


अब घर नहीं, मकान बनते है
पानी के जैसे रूपया खूब बहते है
मूक पेंटिंग और नंगे स्टेचू से
कोने और दिवाल भरे
बेडरूम भी अलग है सबके
डायनिंग टेबल से हॉल भरे
रहने वाला कोई नही है
केवल आंसू बहते है
न दादी न पोता है
न नवजात रोता है
बड़ा या छोटा भाई नहीं है
ननद और भौजाई नहीं है
देखो इन खूबसूरत छतों को
मकड़ी के जाले से सजते है
दरवाज़ों से ना दीवालों से
घर बनता है घर वालों से
परिवार नहीं तो सब बेकार है
ख़ुशी जीवन के यही सार है
यह "राज" की बात हम कहते है
अब घर नहीं मकान बनते है

बेटी और समाज


हाँ, वह लड़की ही है
जो आती तो है इस जहाँ में
बड़े ही जद्दोजहद में
या यूँ कहें कि जबरन उसे
क्यों लाया जाता है

किन्तु परवरिस में उसके
होते है क्यों लाचार
दो-अंखी सा व्यवहार
क्यों किया जाता है

बेटा और बेटी को
तराजु के दो पलड़ों
सा एक सामान
क्यों नहीं किया जाता है

उसे हमेशा दबाया जाता है
ये मत कर, वो मत कर
यहाँ मत आ, वहाँ मत जा
ये क्यों बताया जाता है

घर से पाँव जब बाहर निकलते है
तो नजरें नीचे कर के
आया जाया कर
यह क्यों सिखाया जाता है

अनहोनी भी हो गयी उसके संग
आँख, मुँह बंद कर
आवाज को दबाकर वास्ता समाज
का क्यों दिखाया जाता है

पहला पहला प्यार

ट्यूशन के लिए घर से निकलना,
और रास्ते में उसका घर,
सुबह का आगमन
अब बड़ा ही याद आता है

सर्दी का भोर और साईकल के पैंडल पर जोर
सीधा उसके घर तक लाता था
अलाव तापती दिख जाती थी
अब बड़ा याद आता है

कनखियों से ही देखना,
फिर मुड़कर देखना कुछ आगे जाकर
वह मंद मुस्कान होठों के नीचे
अब बड़ा याद आता है

लौटते वक्त उसका इंतजार करना
कुएँ पर पानी भरना
रस्सी पकड़ कर उसका झुकना
अब बड़ा याद आता है

कुछ अधपके रिश्ते ठीक ऐसे ही होते है
मीठे तो बहुत लगते है,
पर कच्चे होते है
यह सब अब बड़ा याद आता है।

माँ मुझे भी पंख चाहिये

नन्ही कली आँगन में खेलते हुये
चिड़ियों को दाना चुगते देख
खुश होकर माँ के पास आयी
"माँ- माँ मुझे भी पंख चाहिये"

माँ ने प्यार से गले
लगाते हुये
कहा,"तू तो
बिना पंख के ही
एक दिन बहुत
दूर उड़ जायेगी"

पतिया पढ़कर अँखियाँ रोवत

पतिया पढ़कर अँखियाँ रोवत, बतिया कइसे भुलाई
जोगीन होइके सुध-बुध भूले, सथिया कइसे भुलाई

हमका छोड़ि बसे हो बिदेशवा, कुछु न समझ में आई
अम्मा-बाबूजी भी देखत हउवे, बचवा कहिया ले आई

दिन भर काज में बीती जाये, रतिया बिताई न जाई
बिरह बियोग से मदन सतावै, आवे ना औव्हाई

बसंत बयार करेजवा छिलत, देहिया बहुत पिराई
कइसन दरद दिहा बेदर्दी, तू तो भया है कसाई

जो मैं जनती अइसन करबा, देइत न तोहका जाई
फटही धोती पहिन के साजन, देइत उमर बिताई

सुखी रोटी खाइके हमबलम के लेईत रिझाई
अइसन चाकरी पे पाथर पड़े, जो बलम के देत अलगाई