जाना हुआ एक साल गाँव में
सोचा नहीं था वो भी देखा
गाँव में मैंने क्या–क्या देखा
आँगन बीच दीवाल जो देखा
आँखे लोगों की लाल जो देखा
ग्राम पंचायत की चाल जो देखा
गाँव में मैंने क्या–क्या देखा
सूखे खेत औ खलिहान जो देखा
छटपटाता किसान जो देखा
बड़े बाबु का मकान जो देखा
गाँव में मैंने क्या–क्या देखा
मिमियाता इन्सान जो देखा
कहीं नहीं है इमान जो देखा
बोझा हुआ मेहमान जो देखा
गाँव में मैंने क्या–क्या देखा
बात- चीत का ढंग जो देखा
रंग हुआ बेरंग जो देखा
चोर पुलिस के संग जो देखा
गाँव में मैंने क्या–क्या देखा
सच पे पड़ती मार जो देखा
सर पर खून सवार जो देखा
सब फीका त्यौहार जो देखा
गाँव
में मैंने ए सब देखा
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