अब घर नहीं, मकान बनते है
पानी के जैसे रूपया खूब बहते है
मूक पेंटिंग और नंगे स्टेचू से
कोने और दिवाल भरे
बेडरूम भी अलग है सबके
डायनिंग टेबल से हॉल भरे
रहने वाला कोई नही है
केवल आंसू बहते है
न दादी न पोता है
न नवजात रोता है
बड़ा या छोटा भाई नहीं है
ननद और भौजाई नहीं है
देखो इन खूबसूरत छतों को
मकड़ी के जाले से सजते है
दरवाज़ों से ना दीवालों से
घर बनता है घर वालों से
परिवार नहीं तो सब बेकार है
ख़ुशी जीवन के यही सार है
यह "राज" की
बात हम कहते है
अब घर नहीं मकान बनते है
No comments:
Post a Comment